Book Cover

Khoi Hui Kadiyan (खोई हुई कड़ियाँ)

Contributor(s): Kumar, Rakesh Singh (Author)

ISBN: 9789390410064

Publisher: Jvp Publication Pvt Ltd

Binding Types:

$15.99
$28.94 (Final Price)
$27.74 (100+ copies: $26.99)
List/retail price:
$15.99
- +
Buy

Pub Date: March 12, 2020

Lexile Code: 0000

Target Age Group: NA to NA

Physical Info: 0.30" H x 8.50" L x 5.50" W ( 0.38 lbs) 128 pages

BISAC Categories:

Fiction | General

Descriptions, Reviews, etc.

Description: खोई हुई कड़ियां राकेश कुमार सिंह का प्रस्तुत उपन्यास भारतीय समाज में गहराते मूल्यों के दुर्भिक्ष और संवेदनाओं के अकाल में पत्रकारिता के उच्च मानदंडों के प्रति आस्थावान एक खोजी पत्रकार की खोज-यात्रा है। ""जस्टिस डिलेज़ इज़ जस्टिस डिनाएड... न्याय में विलंब अन्याय है!"" भारतीय न्यायालयों में महात्मा गांधी की तस्वीर के साथ यह भी लिखा होता है...""वादकारी का हित सर्वोच्च है।"" इन आप्तवाक्यों की विडंबना यह कि आंखों पर पट्टी बंधी न्यायप्रतिमा के नास्टेल्जिया में डूबी भारतीय न्याय व्यवस्था ने ही ""रिमांड प्रिजनर"", ""अंडरट्रायल प्रिजनर"" या ""विचाराधीन कैदी"" नामक मनुष्य की ऐसी विशिष्ट प्रजाति को जन्म दिया है जो बिना किसी सुनवाई-फैसले के मानों जेल नामधारी किसी अंतहीन सुरंग में कैद है। कुछ लोग तो बीस-तीस वर्षों से और फिलवक्त उन पर आरोप तक तय नहीं किए जा सके हैं। लगभग बारह हजार भारतीय जेलों में न्यायिक अभिरक्षा के नाम पर बंद लगभग ढाई करोड़ मामलों में तकरीबन तीन लाख ऐसे दोपाए समाजशास्त्रीय अध्ययन, चिकित्सा मनोविज्ञान,शोध या आंकड़ों के ""सर्वे सैंपल"" बने जिए जा रहे हैं।इनकी नारकीय जीवन स्थितियां और जटिल मनोविज्ञान हिंदी साहित्य में प्राय अनुपस्थित है। एक खोजी पत्रकार ऐसे ही एक कैदी की खोज में, उसके जीवन की खोई हुई कड़ियों की तलाश में निकलता है तो यह खोज मात्र एक मामूली कैदी की वैयक्तिक त्रासदी और मन स्थितियों से आगे पुलिस तंत्र की संदेहास्पद भूमिका, प्रशासनिक अव्यवस्था, भारतीय कारागारों की अमानवीय स्थितियों,न्यायप्रणाली की विडंबनाओं, अपराध और दंड की मारक विसंगतियों की पोस्टमार्टम डायरी बन जाती है।

Worth Considering
Product successfully added to cart!